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दुर्दांत अपराधी विकास दुबे के अंत के बाद उत्तर प्रदेश में खेली जा रही है जाति-मजहब की घिनौनी राजनीति

दुर्दांत अपराधी विकास दुबे अब भी चर्चा में है। इसकी एक वजह उसके मारे जाने के बाद यह बेसुरा राग छेड़ा जाना भी है कि योगी सरकार में ब्राह्मणों पर अत्याचार हो रहे हैं। दलित-ब्राह्मण समीकरण के सहारे राजनीति करने वाली मायावती ने विकास दुबे के मारे जाने के बाद कहा कि किसी गलत व्यक्ति के अपराध की सजा के तौर पर उसके पूरे समाज को प्रताड़ित और कठघरे में नहीं खड़ा किया जाना चाहिए। उन्होंने संकेत नहीं स्पष्ट तौर पर यही कहने की कोशिश की कि योगी सरकार विकास दुबे के बहाने पूरे ब्राह्मण समाज को प्रताड़ित कर रही है। इन्हीं मायावती ने विकास दुबे के हाथों आठ पुलिसकर्मियों के मारे जाने के बाद कहा था कि इस सनसनीखेज घटना के लिए सरकार को अपराधियों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे इसके लिए विशेष अभियान चलाने की जरूरत क्यों न पड़े।

विकास दुबे को लेकर मायावती ने खेला ब्राह्मण कार्ड

उन्होंने ब्राह्मण कार्ड खेलना शायद इसलिए जरूरी समझा, क्योंकि जाति की राजनीति करने वाले कुछ ब्राह्मण नेता पहले से ही यह प्रचारित करने में लगे हुए थे कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों पर आफत आ गई है। वे इसके लिए आपसी विवाद, रंजिश, संपत्ति विवाद और यहां तक कि लूट-डाके की घटनाओं में मारे गए ब्राह्मण लोगों का भी उल्लेख कर रहे हैं।

कांग्रेस के नेता जितिन प्रसाद भी कर रहे हैं ब्राह्मण जाति पर सियासत 

ऐसा करने वालों में कांग्रेस के नेता जितिन प्रसाद भी हैं। वह ब्राह्मण चेतना परिषद नामक संगठन के संरक्षक हैं। इस संगठन का नारा है-ब्राह्मणों के सम्मान में, जितिन प्रसाद मैदान में। इस संगठन की ओर से ब्रह्म चेतना संवाद चलाया जा रहा है, जिसमें ऐसी कहानियां भी बताई जा रही हैं कि ब्राह्मण समाज के फलाने मोटर साइकिल से जा रहे थे, मास्क लगाए थे, फिर भी पुलिस ने पकड़ लिया।

ट्विटर पर ब्रह्महत्यारा ट्रेंड किया, यूपी में ब्राह्मणों को लेकर योगी सरकार की भावना ठीक नहीं

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की जान-मान पर बन आई है, यह माहौल बनाने के लिए बीते दिनों ट्विटर पर ब्रह्महत्यारा ट्रेंड कराया गया, जिसमें देश भर के कांग्रेसजनों ने बड़े उत्साह से भाग लिया। दून स्कूल में पढ़े जितिन प्रसाद उच्च शिक्षित हैं और केंद्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, लेकिन उन्हें यही लगता है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के मान-सम्मान की रक्षा के लिए उन्हें एकजुट करने की जरूरत है। उनकी मानें तो ब्राह्मणों को लेकर योगी सरकार की भावना ठीक नहीं है। वह किस आधार पर इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं, इसका कोई अता-पता नहीं।

विकास दुबे की आड़ में सरकार पूरे ब्राह्मण समाज को कठघरे में खड़ा कर रही है: जितिन प्रसाद

दरअसल जब मकसद दुष्प्रचार करना हो तो फिर तथ्यों की अनदेखी करना जरूरी हो जाता है। मायावती की तरह जितिन प्रसाद का भी यह कहना है कि विकास दुबे की आड़ में सरकार पूरे समाज को कठघरे में खड़ा कर रही है।

खूंखार अपराधी विकास दुबे के हाथों ब्राह्मण ही ज्यादा मारे गए

इस तरह के बयान नए-अनोखे नहीं हैं, लेकिन इस पर गौर करें कि विकास दुबे के मारे जाने के बाद ब्राह्मण हित की चिंता में दुबले हो रहे लोग यह देखने से इन्कार कर रहे हैं कि इस घोर दुस्साहसी अपराधी के हाथों ब्राह्मण ही ज्यादा मारे गए। इससे बुरी बात और कोई नहीं हो सकती कि विकास दुबे जैसे खूंखार अपराधी के मारे जाने के बाद उसके दुबे होने का उल्लेख कर यह रोना रोया जाए कि ब्राह्मण समाज को परेशान किया जा रहा है। इस तरह की दलीलें बहानेबाजी के अलावा और कुछ नहीं कि हम तो एनकाउंटर के तरीके पर सवाल उठा रहे हैं। आखिर यह सवाल अभी क्यों? क्या पहले शुभ मुहूर्त नहीं था? इस तरह की क्षुद्र राजनीति नई नहीं है।

विकास दुबे के मारे जाने पर शुरू हुई जाति की गंदी राजनीति

विकास दुबे के मारे जाने पर शुरू हुई जाति की गंदी राजनीति ने राजस्थान के गैंगस्टर आनंदपाल सिंह की याद ताजा करा दी है। वह भी एक कुख्यात अपराधी था। उस पर दस लाख का इनाम था। उसे एक पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद राजस्थान के राजपूत नेताओं ने हंगामा मचा दिया था। वास्तव में यह हंगामा नहीं, उपद्रव था। इस उपद्रव में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी और उस दौरान पुलिस को भी निशाना बनाया गया था। उस समय भी राजस्थान के कई राजपूत नेताओं ने राजपूतों के साथ कथित अन्याय का रोना रोया था। उसका एनकाउंटर में मारा जाना पिछले विधानसभा में एक चुनावी मसला बन गया था।

गीतकार जावेद अख्तर ने दिल्ली दंगों के आरोपी ताहिर हुसैन के प्रति हमदर्दी जताई

केवल राजनीतिक दुकान चलाने वाले ही विकास दुबे या आनंदपाल सिंह जैसे तत्वों को मोहरा नहीं बनाते। गैर राजनीतिक लोग भी यह काम करते हैं। वह भी इस या उस बहाने आपराधिक तत्वों के साथ खड़े होने का काम करते हैं। दिल्ली दंगों के दौरान जिस ताहिर हुसैन के घर को दंगाइयों ने सुरक्षित मोर्चा बना लिया था और जहां खुफिया ब्यूरो के कर्मचारी की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी गई थी उसे सील किए जाने की दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सबसे ज्यादा तकलीफ गीतकार जावेद अख्तर को हुई थी। हालांकि वह खुद को नास्तिक, धर्मनिरपेक्ष तर्कवादी वगैरह बताते हैं, लेकिन उन्होंने ताहिर हुसैन के प्रति हमदर्दी जताने में संकोच नहीं किया।

दंगों की साजिश रचने का आरोपित ताहिर हुसैन बेचारा है: मुस्लिम समाज

इस संकोच का परित्याग कई मुस्लिम पत्रकारों ने भी किया। वे आज भी बेशर्मी के साथ इस दुष्प्रचार की बीन बजा रहे हैं कि दंगों की साजिश रचने का आरोपित ताहिर हुसैन बेचारा है, खुलेआम गोली चलाने वाला शाहरुख भोला-भाला है और जाकिर नाइक से दोस्ती गांठने वाला खालिद सैफी सांप्रदायिकता के खिलाफ अलख जगाने वाला नेक बंदा है। यह बेशर्मी की हद है, लेकिन यह हद पहले भी पार होती रही है और इसी कारण माफिया तत्व राजनीति में सक्रिय होकर विधायक और सांसद बनते रहे हैं।

जाति-मजहब के नाम पर घिनौनी राजनीति

इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि जाति-मजहब के नाम पर की जानी वाली राजनीति इस हद तक गिर जाए कि कुख्यात अपराधियों के पक्ष में खड़े होने में संकोच न किया जाए। पता नहीं इस घटिया राजनीति पर लगाम कैसे लगेगी, लेकिन यह समझने की सख्त जरूरत है कि पुलिस और न्यायिक सुधार अनिवार्य हो चुके हैं। समय पर सही न्याय इस तरह की राजनीति पर लगाम लगाने का काम करेगा।

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