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तृणमूल कांग्रेस के शासन में राजनीतिक हिंसा: पश्चिम बंगाल में भाजपा विधायक की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत

पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले में भाजपा विधायक देबेंद्रनाथ जिस तरह एक दुकान के बाहर फांसी के फंदे पर लटके मिले उससे यही अधिक लगता है कि उनकी हत्या की गई है। इस आशंका को इससे भी बल मिल रहा है कि उनका शव एक सार्वजनिक जगह पर लटकता मिला। हालांकि उनके पास से एक कथित पत्र मिलने की बात कही जा रही है जिसमें उन्होंने अपनी मौत के लिए कुछ लोगों को जिम्मेदार बताया है, लेकिन उसकी सत्यता पर यकीन करना कठिन है। एक तो कोई भी सार्वजनिक तौर पर फांसी लगाकर आत्महत्या नहीं करता और दूसरे यह समझना कठिन है कि आखिर कोई विधायक इस तरह अपनी जान क्यों देगा? इसमें संदेह है कि बंगाल पुलिस की ओर से की जाने वाली जांच तह तक जाने में सफल होगी।

यदि विधायक की मौत की सीबीआइ जांच की मांग हो रही है तो उसके पीछे कुछ ठोस आधार दिखते हैं। एक विधायक की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत बंगाल की उस खूनी राजनीति का ही स्मरण करा रही है जिसके तहत विरोधी दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर हमले होना आम बात हो गई है। बंगाल राजनीतिक हिंसा के लिए हमेशा से कुख्यात रहा है। वाम दलों के लंबे शासन में यहां राजनीतिक हिंसा को खूब बढ़ावा मिला, क्योंकि वाम विचारधारा विरोधियों से निपटने के लिए उनका खात्मा करना भी जायज मानती है।

माना जा रहा था कि तृणमूल कांग्रेस का शासन राजनीतिक हिंसा के खूनी दौर पर लगाम लगाएगा और बंगाल में सचमुच परिवर्तन लाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने वाम दलों के ही हिंसक तौर-तरीके अपना लिए। वास्तव में तृणमूल कांग्रेस ने खुद को एक तरह से वाम दलों में तब्दील कर लिया है। हालात इसलिए और खराब हो गए हैं, क्योंकि राजनीतिक हिंसा में लिप्त तत्वों को पुलिस और प्रशासन की ओर से भी संरक्षण मिलता है। हालांकि बंगाल में विधानसभा चुनाव अगले साल हैं, लेकिन हिंसक राजनीतिक टकराव का सिलसिला यही बताता है कि हिंसा-हत्या के सहारे चुनाव जीतने की तैयारी शुरू हो गई है।

बंगाल में शायद ही कोई सप्ताह ऐसा गुजरता हो जब कहीं न कहीं राजनीतिक हिंसा की वारदात न होती हो। बीते सप्ताह ही तृणमूल कांग्रेस और एक वामपंथी संगठन के बीच झड़प में दोनों पक्षों के एक-एक नेता की जान गई। इससे पहले एक ही दिन अलग-अलग घटनाओं में पांच लोग मारे गए थे। अगर यह सिलसिला थमा नहीं तो बंगाल विधानसभा चुनाव तक रक्तरंजित हो जाएगा। दुर्भाग्य से इस खूनी सिलसिले को थामना आसान नहीं, क्योंकि राजनीति, पुलिस और प्रशासन से जुड़े आवश्यक सुधार आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहे हैं।

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